Kabir Das ji ke Dohe, anrate sukh sovna

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अनराते सुख सोवना, राते नींद न आय |
ज्यों जल छूटी माछरी, तलफत रैन बिछाय ||

व्याख्या:

जिन्हें स्वरूपस्तिथि (कल्याण)में प्रेम नहीं है, वे विषय – मोह में सुख से सोते हैं परन्तु कल्याण प्रेमी को विषय मोह में नींद नहीं लगती | उनको तो कल्याण की प्राप्ति के लिए वैसी ही छटपटाहट रहती है, जैसे जल से बिछुड़ी मछली तडपते हुए रात बिताती है |

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