Kabir Das ji ke Dohe, bhavra bari parihara

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भँवरा बारी परिहरा, मेवा बिलमा जाय |
बावन चन्दन धर किया, भूति गया बनराय ||

व्याख्या:

मनुष्य को ज्ञान होने पर – मन भँवरा विषय बाग लो त्यागकर, सतगुणरुपी मेवे के बाग में जाकर रम गया| स्वरुप – ज्ञानरुपी छोटे चन्दन – वृक्ष में स्थित किया और विस्तृत जगत – जंगल को भूल गया|

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