Kabir Das ji ke Dohe, Chal Bakul ki Chalat hai

  • Post comments:0 Comments

चाल बकुल की चलत है, बहुरि कहावै हंस |

ते मुक्ता कैसे चुगे, पड़े काल के फंस ||

भावार्थ:

जो बगुले के आचरण में चलकर, पुनः हंस कहलाते हैं वे ज्ञान – मोती कैसे चुगेगे ? वे तो कल्पना काल में पड़े हैं |

Leave a Reply