Kabir Das ji ke Dohe, Jau Manush Grah Dharm yukt

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जौ मानुष ग्रह धर्म युत, राखै शील विचार |

गुरुमुख बानी साधु संग, मन वच सेवा सार ||

भावार्थ:

जो ग्रहस्थ – मनुष्य गृहस्थी धर्म – युक्त रहता, शील विचार रखता, गुरुमुख वाणियों का विवेक करता, साधु का संग करता और मन, वचन, कर्म से सेवा करता है उसी को जीवन में लाभ मिलता है |

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