Kabir Das ji ke Dohe, khod khad dharti sahe

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खोद खाद धरती सहै, काट कूट बनराय |
कुटिल वचन साधु सहै, और से सहा न जाय ||

व्याख्या:

खोद – खाद प्रथ्वी सहती है, काट – कूट जंगल सहता है |
कठोर वचन सन्त सहते हैं, किसी और से सहा नहीं जा सकता |

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