Kabir Das ji ke Dohe, Man ki ghali hu gayi

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मन की घाली हुँ गयी, मन की घालि जोऊँ |

सँग जो परी कुसंग के, हटै हाट बिकाऊँ ||

भावार्थ:

मन के द्वारा पतित होके पहले चौरासी में भ्रमा हूँ और मन के द्वारा भ्रम में पड़कर अब भी भ्रम रहा हूँ| कुसंगी मन – इन्द्रियों की संगत में पड़कर, चौरासी बाज़ार में बिक रहा हूँ|

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