Kabir Das ji ke Dohe, manhanta man mari le

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महमंता मन मारि ले, घट ही माहीं घेर |
जबही चालै पीठ दे, आँकुस दै दै फेर ||

भावार्थ:

व्याख्या:
अन्तः करण ही में घेर – घेरकर उन्मत्त मन को मार लो| जब भी भागकर चले, तभी ज्ञान अंकुश दे – देकर फेर लो|

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