Kabir Das ji ke Dohe, une aai baadri

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ऊनै आई बादरी, बरसन लगा अंगार |
उठि कबीरा धाह दै, दाझत है संसार ||

व्याख्या:

अज्ञान की बदरी ने जीव को घेर लिया, और काम – कल्पना रुपी अंगार बरसने लगा| ऐ जीवों! चिल्लाकर रोते हुआ पुकार करते रहो कि “संसार जल रहा है “|

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